क्युकी वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे।


कल तक जो प्यार जता रहे थे आज वो नफरत बता रहे हे,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हें।।

होता था संपर्क, करते थे रोज़ बात,
होती थी मुलाकात, दिन हो या रात,
अब वो हम से कतरा रहे हे,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे...

बना रहे थे संगठन, सब को साथ ले चल रहे थे,
कोई कुछ कहे संगठन के साथ रह रहे थे,
आज वो सिर्फ अपने उत्पादनो का साथ दे रहे हें,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे...

जब तक थे उनके उत्पादनों के साथ, बेचते रहे उन्हे अपने हाथ,
तब तक हर जगह प्यार जता रहे थे, अपने साथ बता रहे थे,
जैसे ही छुटा उत्पादनों का साथ, हमें उपेक्षा जता रहें हें,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे...

संगठन मे था मशहूर, जिस आंगन का नाम,
वहा के फुल कम हुए जा रहे हें,
अपने स्वार्थ को संगठन का नाम दिये जा रहे हें,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे...

कुछ तो बदला हे नाम कल ओर आज में,
स्वार्थ की वजह से नेंतृत्व का समाज में,
फिर भी हम उसे चला रहे हें, अपना उन्हे बना रहे हें,
क्युकी अब वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चला रहे हे...

Comments

  1. किसी गहरी व्यथा से जन्मा यह काव्यमय प्रस्तुतिकरण किसी बुरे अनुभव से होकर गुजरा होगा । प्रयास प्रशंसनीय है , लिखते रहिये । हृदयपूर्वक शुभेच्छा ।

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    1. प्रभू कृपा से मुझे ऐसी कोई व्यथा अभी तो नहि हे.. किसी के अनुभव से कुछ विचार आये थे उन्हे रखने की कोशिश की हे।।

      आपकी शुभकामनाओ के लिये धन्यवाद
      आप सब का साथ रहा तो बिलकुल प्रयास जारी रखुंगा।।

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    2. It's your real inner pain Jo paper pe aaya

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    3. By god grace till now i dont hv such pain...

      Bt tried to pen down the situation nw days...

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  2. खूब! इस कविता को बृहत् संदर्भ दे सकते हैं, लेकिन इसके पीछे कुछ तात्कालीक संदर्भ है?

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    1. अभी तो सिर्फ विचार हे,

      आशा हे की कुछ पहल होगी ओर इसका उपयोग भी होगा।।

      शुभकामनाओ के लिये धन्यवाद।।

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  3. This comment has been removed by the author.

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