मंजिल


दर्द सा दबा था दिल मे,
कुछ ना लग रहा था अच्छा जगमे...

बन गयी थी वीरान ज़िन्दगी,
कर के अपने सफलता की बन्दगी...

समज न आया किस तरह उसे समज़ाऊ,
कैसे इस से बाहर लाऊ...

आखिर एक उपाय आजमाया,
उसे जोश सा एक गीत सुनाया,
एक लौ बनायी जलती आग सी,
जिसने बना ली उसने जीने की आस सी....

कहा उसे अपना एक सपना बना,
उसके साथ जीने को अपना बना,
बना वो हुनर खुद मे,
की अपने सपने का तू ही रास्ता बना...

रख वो अंदाज़ जीने का,
अपने इस चौडे सिने का,
दूर दिखे मंज़िल जो तुझे,
उसे खिंच के लाना हे तुज़े ...

कर्तव्य पथ से बना वो इतिहास,
हर कोई करे बस ऐसी आस,
बन जाऊ मे भी वो दिल की हौंश,
जिसमे था मंजिल खिंच लाने का जोश...

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